संविधान क्या है ? भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषताए ( Salient Featursof Indian Constitution )
संविधान ( Constitution )
किसी भी देश का मौलिक कानून है जो सरकार के विभिन्न अंगों की रूपरेखा और मुख्य कार्य का निर्धारण करता है। साथ ही यह सरकार और देश के नागरिकों के बीच संबंध भी स्थापित करता है। भारतीय संविधान का निर्माण एक विशेष संविधान सभा के द्वारा किया गया है, और इस संविधान की अधिकांश बातें लिखित रूप में है।
“ मैं अनुभव करता हूं कि भारतीय संविधान कार्य संचालन योग्य है लचीला है तथा इसमें शांति काल का युद्ध काल में देश की एकता बनाए रखने का सामर्थ्य है |” ---- Dr.अंबेडकर
किसी भी देश के संविधान में राजनीतिक व्यवस्था में उस देश की आस्थाओं विश्वासम आधारभूत शाश्वत मूल्यों और सिद्धांतों के समेकित दर्शन होते हैं |
हमारा संविधान एक तरफ मौलिक राजनीतिक सिद्धांतों को परिभाषित करता है |वहीं दूसरी तरफ विभिन्न संरचनाओं और प्रक्रियाओं को स्थापित करता है | इस प्रक्रिया में मौलिक अधिकार नीति निर्देशक सिद्धांत व नागरिकों के मूल कर्तव्य भी शामिल है | यह दुनिया का ऐसा लिखित कानूनी दस्तावेज है , जिसे लिखने में सर्वाधिक समय 2 वर्ष 11 माह 18 दिन लगे इसे एक संविधान सभा ने तैयार किया |
संविधान के मूल वैचारिक आधार की अभिव्यक्ति को अत्यंत संक्षिप्त रूप से प्रस्तावना शीर्षक में व्यक्त किया गया है जिसमें किसी भी परिस्थिति में परिवर्तन नहीं किया जा सकता है | हमारे संविधान में उन आदेशों को सम्मिलित किया गया है जो संविधान की लोकतंत्र के प्रति प्रतिबद्धता , सभी लोगों की स्वतंत्रता , समानता व न्याय को सुनिश्चित करता है |
भारतीय संविधान की विशेषताएं ( Salient Featursof Indian Constitution )
1.संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न संविधान –(Sovereign Constitution)
भारत का संविधान लोकप्रिय प्रभुसत्ता पर आधारित संविधान है अर्थात यह भारतीय जनता द्वारा निर्मित है | इस संविधान द्वारा अंतिम शक्ति भारतीय जनता को प्रदान की गई है | संविधान की प्रस्तावना में कहा गया है कि हम भारत के लोग इस संविधान को अंगीकृत अधिनियमित साथ आत्मार्पित करते हैं अर्थात भारतीय जनता ही इसकी निर्माता है जनता ने स्वयं की इच्छा से इसे अंगीकार अधिनियमित व आत्मा अर्पित किया है इसे किसी अन्य सत्ता द्वारा थोपा नहीं गया है |
2.प्रस्तावना (Preamble) -
भारतीय संविधान के मौलिक उद्देश्य एंव लक्ष्यों को संविधान की प्रस्तावना में दर्शाया गया है |
डॉक्टर के एम मुंशी ने इसे संविधान की राजनीतिक कुंडली का है | इसके महत्व को देखते हुए इसे संविधान की आत्मा भी कहा जाता है | प्रस्तावना की शुरुआत में हम भारत के लोग से अभिप्राय है कि अंतिम प्रभुसत्ता भारतीय जनता में निहित है | यह संविधान की मुख्य विशेषता है |
3.विश्व का सबसे विशाल संविधान ( Largest Constitution of the world)-
जहां अमेरिका के संविधान में 7 अनुच्छेद , कनाडा के संविधान में 147 अनुच्छेद ,आस्ट्रेलिया के संविधान में 128 अनुच्छेद , दक्षिण अफ्रीका के संविधान में 153 अनुच्छेद ,वही हमारा संविधान व्यापक व विस्तृत संविधान है इसमें 395 अनुच्छेद 22 भाग व 12 अनुसूचियां 5 परिशिष्ट है | इसमें अब तक 101 संशोधन हो चुके हैं और संशोधन की यह प्रक्रिया अनवरत जारी है इस कारण भी इसका स्वरूप विशाल हो जाता है |
संविधान की इसी विशालता को लेकर हरि विष्णु कामथ ने कहा था कि “ हमें इस बात का गर्व है कि हमारा संविधान विश्व का सबसे विशाल संविधान है ” |
नोट ;- संविधान का 101 वां संशोधन वस्तू व सेवा कर( जीएसटी) से संबंधित है जिसे राष्ट्रपति जी ने सितंबर 2016 में हस्ताक्षरित किया है |
4.लिखित एवं निर्मित संविधान (Written and Created Constitution)-
भारतीय संविधान संविधान सभा द्वारा निर्मित एवं लिपिबद्ध किया गया दस्तावेज है | संविधान सभा ने इसे 2 वर्ष 11 माह 18 दिन में तैयार किया था | विस्तृत संविधान होने के बावजूद इससे देश की परिस्थितियों में आवश्यकताओं को दृष्टिगत रखते हुए उसमें संशोधन की व्यवस्था भी की गई है | अब तक इसमें 101 संशोधन हो चुके हैं |
5.संसदीय शासन व्यवस्था (Parliamentary System Of Goverment) -
डॉक्टर भीमराव अंबेडकर के अनुसार संसदात्मक प्रणाली में शासन के उत्तरदायित्व का मूल्यांकन एक निश्चित समय बाद तो होता ही है इसके साथ-साथ दिन प्रतिदिन भी होता रहता है | इस प्रणाली में कार्यपालिका व्यवस्थापिका के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदाई होती है | राष्ट्रपति का पद गरिमा व प्रतिष्ठा का होता है पर उसकी स्थिति संवैधानिक प्रदान की है ,वास्तविक शक्तियां मंत्रिमंडल के द्वारा प्रयोग की जाती है | संसद का विश्वास समाप्त होने पर मंत्रिमंडल को त्यागपत्र देना पड़ता है | इस व्यवस्था से प्रधानमंत्री ही मंत्रिमंडल का नेतृत्व करता है | भारत में संसदीय व्यवस्था को केंद्र के साथ राज्यों में भी अपनाया गया है जहां राज्यपाल संवैधानिक प्रमुख होता है |
6.मौलिक अधिकार व कर्तव्य ( Fundamental Rights And duties) -
भारतीय संविधान में नागरिकों के मूल अधिकारों का वर्णन संविधान के भाग 3 में अनुच्छेद 12 से 35 तक किया गया है | संविधान निर्माताओं ने 7 मौलिक अधिकार देश के नागरिकों को दिए थे |
समता का अधिकार , स्वतंत्रता का अधिकार , शोषण के विरुद्ध अधिकार , धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार ,संस्कृति व शिक्षा संबंधी अधिकार , संवैधानिक उपचारों का अधिकार , संपत्ति का अधिकार |
भारतीय संविधान में 44 वें संविधान संशोधन के बाद संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकार की सूची से हटा दिया गया है | वर्तमान में अब मौलिक अधिकार 6 है | इन अधिकारों का हनन होने पर नागरिक न्यायालय की शरण ले सकते हैं | 86 वें संविधान संशोधन 2002 जो कि जुलाई 2009 में संसद में पारित किया गया व 1 अप्रैल 2010 को लागू हुआ , के द्वारा शिक्षा के अधिकार को मूल अधिकार के रूप में संविधान में शामिल कर लिया गया | अब अनुच्छेद 21 के बाद एक नया अनुच्छेद 21a जोड़ा गया जिसके अनुसार 6 से 14 वर्ष की उम्र के सभी बच्चों को अनिवार्य निशुल्क शिक्षा प्राप्त की व्यवस्था करना राज्य का दायित्व है |
42 वें संविधान संशोधन 1976 के द्वारा नागरिकों के 10 मूल कर्तव्य निर्धारित किए गए | जिनका का पालन करना प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक दायित्व है | उदहारण में मूल कर्तव्य - संविधान का पालन करना , भारत की संप्रभुता , एकता व अखंडता की रक्षा करना , भाईचारे की भावना रखना , प्रकृति व पर्यावरण की रक्षा करना आदि प्रमुख कर्तव्य है जो अप्रैल 2010 से लागू शिक्षा के अधिकार संबंधी 86 वा संविधान संशोधन द्वारा 11 मूल कर्तव्य भी संविधान में जोड़ दिया गया | जिसके अनुसार 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों को शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराना अभिभावकों का कर्तव्य है | अतः वर्तमान में मूल कर्तव्यों की संख्या 11 है |
7.राज्य के नीति निर्देशक तत्व (Directive Principles of State Policy) -
आयरलैंड के संविधान से प्रेरित होकर संविधान के भाग 4 में नीति निर्देशक तत्वों का वर्णन किया गया है | राज्य के नीति निदेशक तत्व वे विचार है जो भविष्य में बनने वाली सरकार के समक्ष पथ प्रदर्शक की भूमिका का निर्वहन करते हैं | यद्यपि इनके क्रियान्वयन के लिए सरकार को बाध्य नहीं किया जा सकता | यह न्यायालय में वाद योग्य भी नहीं है | लोक कल्याणकारी राज्य के लिए आवश्यक होने के कारण किसी भी सरकार द्वारा इनकी उपेक्षा संभव नहीं है |
8.समाजवादी राज्य (Socialist State) -
42 वें संविधान संशोधन 1976 द्वारा भारत को समाजवादी गणराज्य घोषित किया गया | यद्यपि मूल संविधान में यह शब्द नहीं जोड़ा गया था |
9.व्यस्क मताधिकार (Adult Franchise) -
हमारे देश के संविधान में 18 वर्ष की आयु प्राप्त करने वाले प्रत्येक नागरिकों को समान रूप से मताधिकार प्रदान किया गया | यद्यपि मूल संविधान में 21 वर्ष की आयु निर्धारित की गई थी किंतु बाद में संविधान में 61 में संविधान संशोधन द्वारा 18 वर्ष कर दी गई |
10.पंथनिरपेक्ष राज्य (Secular State)-
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 के अनुसार धर्म के क्षेत्र में प्रत्येक नागरिक को स्वतंत्र प्रदान की गई है | धार्मिक मामलों में राज्य ने एक तटस्थ दृष्टिकोण अपनाया है , न तो किसी धर्म विशेष को राज्य धर्म माना है , न हीं किसी समुदाय विशेष को धार्मिक आश्चर्य प्रदान किया है | धर्म के आधार पर किसी भी नागरिक से भेदभाव नहीं किया जा सकता | राज्य का कोई आधिकारिक धर्म नहीं है | संविधान सभा ने मूल संविधान में पंथनिरपेक्ष शब्द का प्रयोग नहीं किया गया था , किंतु 42 वें संविधान संशोधन द्वारा पंथनिरपेक्ष शब्द संविधान की प्रस्तावना में जोड़ा गया |
11.एकात्मक व संघात्मक तत्वों का अद्भुत सहयोग (Remarkable Fusion of Unitary and Federal Elements ) -
भारत एक संघात्मक राज्य है | वर्तमान में संघ शब्द के स्थान पर यूनियन ऑफ स्टेट शब्द का प्रयोग किया गया है |
संविधान के पहले अनुच्छेद में कहा गया है कि भारत राज्यों का एकक होगा जिसे प्रचलन में राज्यों का संघ भी कहा जाता है | संविधान निर्माताओं की आकांक्षा ऐसा संविधान बनाने की थी जिसमे केंद्र सरकार भारत की एकता को बनाए रखें तथा राज्यों को भी स्वतंत्रता प्राप्त हो | इसके लिए इसमें संघात्मक और एकात्मक तत्वों का मिश्रण किया गया है | संविधान के अनेक प्रावधान केंद्र को राज्य के अपेक्षा शक्तिशाली बनाते हैं | जैसे अति महत्वपूर्ण विषयों को संघ सूची में स्थान , समवर्ती सूची में केंद्र के निर्णय को प्रमुखता , अवशिष्ट शक्तियां केंद्र के पास , आपातकाल में केंद्र का राज्यों पर नियंत्रण , इकहरी नागरिकता , अखिल भारतीय सेवाएं , संसद को राज्यों के पुनर्गठन का अधिकार , राष्ट्रपति द्वारा राज्यपालों की नियुक्ति , राज्यों की केंद्र पर आर्थिक निर्भरता केंद्र को मजबूती प्रदान करती है | राज्य अपना प्रथक संविधान नहीं रख सकते केवल एक ही संविधान केंद्र व राज्य दोनों पर लागू होता है |
12.स्वतंत्र न्यायपालिका (Independent Judiciary) -
संविधान की सर्वोच्चता प्रजातंत्र की रक्षा , जनता के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए भारतीय संविधान में कहीं संवैधानिक व्यवस्थाएं की गई है | भारत के राष्ट्रपति द्वारा सर्वोच्च तथा उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति की जाती है | तथा उन्हें संसद में महाभियोग द्वारा हटाया जा सकता है | कार्यपालिका के आदेश तथा व्यवस्थापिका के कानून यदि संवैधानिक व्यवस्थाओं का उल्लंघन करते हैं तो न्यायपालिका को न्यायिक पुनरावलोकन विधि से उन्हें अवैध घोषित करने का अधिकार है | नागरिकों के मूल अधिकारों की रक्षा के लिए अनुच्छेद 32 के अंतर्गत पुनरावलोकन विधि द्वारा बंदी प्रत्यक्षीकरण , अधिकार पृच्छा जैसे लेखों को जारी किया जा सकता है |
13.कठोरता वे लचीलापन का मिश्रण (Combination of Rigidity And Flexibility ) -
भारतीय संविधान कठोरता व् लचीलापन का मिश्रण है | किसी भी देश की परिस्थितियों में बदलाव के साथ संवैधानिक संशोधन की आवश्यकता होती है | संवैधानिक संशोधन के लिए भारतीय संविधान में संशोधन विधि अनुच्छेद 368 में दी गई है | यह संशोधन विधि दक्षिण अफ्रीका के संविधान से ली गई है | संविधान में संशोधन व्यवस्था कुछ भागों के संबंध में कठोर तो कुछ भागों में लचीली रखी गई है | संविधान में कठोरता का समावेश संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान से ,लचीलापन का ब्रिटेन से लिया गया है |
भारतीय संविधान में संशोधन की तीन विधियां है –
प्रथम - संविधान के कुछ भागों में संसद के दोनों सदनों के साधारण बहुमत से संशोधन किया जा सकता है |जैसे राज्यों का पुनर्गठन , राज्य में विधान परिषद की स्थापना या समाप्ति, केंद्र प्रशासित क्षेत्र बनाना ,संसद सदस्यों के वेतन आदि |
दूसरी - कुछ विषयों में संशोधन के लिए संसद के दोनों सदनों के पूर्ण बहुमत व उपस्थित सदस्यों के दो तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है |
तीसरी- कुछ विषयों में संशोधन के लिए संसद के दोनों सदनों के पूर्ण बहुमत , उपस्थित सदस्यों के दो तिहाई बहुमत के अतिरिक्त कम से कम आधे राज्यों के विधान मंडलों का समर्थन आवश्यक है | जैसे राष्ट्रपति निर्वाचन की पद्धति, केंद्र व राज्यों के बीच शक्ति विभाजन आदि विषयों के संशोधन के लिए यह जटिल प्रक्रिया अपनाई जाती है | संविधान के इन तीन विधियो से स्पष्ट होता है कि संविधान संशोधन के लिए लचीले व् कठोरता का मिश्रण किया गया है |
14.न्यायिक पुनरावलोकन व् संसदीय संप्रभुता का समन्वय (Harmony Between Judicial Review And Parliamentary Supremacy) -
भारतीय संविधान में न्यायिक पुनरावलोकन के सिद्धांत व संसदीय संप्रभुता के मध्य मार्ग को अपनाया गया है | हमारे संविधान में संसद को सर्वोच्च माना गया है , साथ ही उसको नियंत्रित करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय को संविधान की व्याख्या करने का अधिकार प्रदान किया गया है | न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय कार्यपालिका के उन आदेशों तथा संसद द्वारा निर्मित विधि को अवैध घोषित कर सकता है जो संविधान की भावना के अनुरूप नए हो |
15.विश्व शांति का समर्थक (Advocate of World Peace) -
“ वसुदेव कुटुंबकम ” के सिद्धांत को अपनाते हुए भारतीय संविधान में विश्वशांति का समर्थन किया गया है | नीति निर्देशक तत्व में अनुच्छेद 51 के अनुसार राज्य का यह कर्तव्य है कि वह अंतरराष्ट्रीय शांति व सुरक्षा तथा राष्ट्रों के बीच न्याय पूर्ण में सम्मानजनक संबंधों की स्थापना करें | भारत न तो किसी देश की सीमा व आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करना चाहता है , ना ही अपने देश में किसी देश के हस्तक्षेप को बर्दाश्त करता है | भारत सरकार ने इसी भावना के अनुरूप पंचशील एवं गुटनिरपेक्षता की नीति को अपनाया है |
16.आपातकालीन उपबंध (Emergency Provisions) –
संविधान के भाग 18 में आपातकालीन उपबंधों का स्पष्ट उल्लेख किया गया है | अनुच्छेद 352 के अनुसार बाहरी आक्रमण , सशस्त्र विद्रोह , युद्ध की स्थिति में | अनुच्छेद 356 के अनुसार राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता की स्थिति में तथा अनुच्छेद 360 के अनुसार वित्तीय संकट उत्पन्न होने पर संपूर्ण देश है | देश के किसी भाग में आपातकालीन लागू किया जा सकता है | इसमें शासन राष्ट्रपति के अधीन संचालित होता है |
17.इकहरी नागरिकता (Single Citizenship) -
भारतीय संविधान द्वारा संघात्मक शासन की व्यवस्था की गई है और सामान्यतः संघ राज्य के नागरिकों को दोहरी नागरिकता प्राप्त होनी चाहिए - प्रथम संघ की नागरिकता , द्वितीय राज्य की नागरिकता | लेकिन भारतीय संविधान निर्माताओं का विचार था कि दोहरी नागरिकता भारत की एकता को बनाए रखने में बाधक हो सकती है | अतः संविधान निर्माताओं द्वारा संविधान में संघ राज्य की स्थापना करते हुए इकहरी नागरिकता के आदर्श को अपनाया गया है |
18.लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना का आदर्श ( Ideal of Establishing Welfare State ) -
संविधान के नीति निर्देशक तत्वों से यह स्पष्ट हो जाता है कि संविधान निर्माताओं द्वारा संविधान के माध्यम से कल्याणकारी राज्य की स्थापना का आदर्श निश्चित किया गया है |
19.अल्पसंख्यक एवं पिछड़े वर्गों के कल्याण की विशेष व्यवस्था ( Special Provisions for Welfare Of Minority And Backward Classes)-
भारतीय संविधान में अल्पसंख्यकों के धार्मिक , भाषाई और सांस्कृतिक हितों की रक्षा के लिए विशेष व्यवस्था की गई है | इसके अतिरिक्त संविधान अनुसूचित जातियों व् जनजाति क्षेत्रों के नागरिकों को सेवाओं , संसद , विधानसभाओं और अन्य क्षेत्रों में विशेष संरक्षण प्रदान किया गया है | संविधान के अनुच्छेद 330 व् 332 के तहत अनुसूचित जातियों व अनुसूचित जनजातियों को लोकसभा व विधानसभाओं में आरक्षण प्रदान किया गया है | प्रारंभ में यह व्यवस्था 25 जनवरी 1960 तक के लिए की गई थी किंतु संविधान में संशोधन कर इसकी समय सीमा को बढ़ाया जाता रहा है | अब 95 वे संविधान संशोधन 2010 के आधार पर आरक्षण की व्यवस्था को 25 जनवरी 2020 तक के लिए बढ़ा दिया गया है | अनुच्छेद 335 में अनुसूचित जातियों व् जनजातियों के लिए सरकारी सेवाओं में आरक्षण के लिए कोई समय सीमा निर्धारित नहीं की गई | इसी तरह अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए केंद्र सरकार की सेवाओं में सितंबर 1993 से 27% आरक्षण लागू किया गया |
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जय हिन्द
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